Sunday, 4 December 2011

क्यूँ .. आखिर क्यूँ ?



क्या मेरी बिंदिया में तुमने
सूरज को छिपा रखा था ?
क्या मेरे कंगन से तुमने
चाँद को तराशा था ?
क्या मेरी खुशबु से अपनी
सांवली रात को महकाया था ?
क्या मेरी आँखों से तुमने
अपने घर का दिया जलाया था ?
क्या मेरी पायल की आवाज़ से
तुमने अपने अश्कों को बांधा था ?

पर क्यूँ .. मैं तो वहीँ थी
हरदम तुम्हारे आस-पास
फिर क्यूँ तुमने .. मुझे नहीं पुकारा ?
फिर क्यूँ मेरी यादों से
अपने मकां को सजाया ?
फिर क्यूँ तुमने अपने ख्वाबों को बस
ख्वाब ही रहने दिया ?

क्यूँ .. आखिर क्यूँ ?

गुंजन
9/9/11

7 comments:

  1. wah gunjan ji .bahut umda.........

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  2. आदरणीया गुंजन जी
    सस्नेहाभिवादन !

    आपके ब्लॉग पर आ'कर बहुत ख़ुशी हुई है :)

    आपकी अन्य रचनाओं सहित प्रस्तुत रचना भी प्रभावित करती है -
    क्या मेरी बिंदिया में तुमने
    सूरज को छिपा रखा था ?
    क्या मेरे कंगन से तुमने
    चाँद को तराशा था ?
    क्या मेरी खुशबु से अपनी
    सांवली रात को महकाया था ?

    बहुत सुंदर भावप्रवण पंक्तियां हैं !

    कविता अपनी सही दिशा में आगे बढ़ी है …
    मैं तो वहीं थी
    हरदम तुम्हारे आस-पास
    फिर क्यूँ तुमने .. मुझे नहीं पुकारा ?
    फिर क्यूँ मेरी यादों से
    अपने मकां को सजाया ?
    फिर क्यूँ तुमने अपने ख्वाबों को बस
    ख्वाब ही रहने दिया ?

    क्यूँ .. आखिर क्यूँ ?


    वाह वाऽऽह… !

    समय निकाल कर मेरे ब्लॉग्स पर भी आइएगा :)

    बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  3. बहुत सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति..

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  4. saral shabdon mein sundar kavita

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  5. वाह! बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना...
    सादर...

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  6. शायद कोई मजबूरी रही हो ... लजवाब रचना ...

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